नई दिल्ली | भारतीय रुपया गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.20 के रिकॉर्ड ऑल टाइम लो पर पहुंच गया। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध, एनर्जी सप्लाई में बाधा और विदेशी निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली के चलते रुपये पर दबाव बढ़ गया है।
विदेशी ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन के अनुसार, अगर ईरान से जुड़ा संघर्ष लंबा खिंचता है तो रुपया ₹98 प्रति डॉलर तक गिर सकता है। गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया ₹90 के पार गया था, और 2026 की शुरुआत से ही इसमें लगातार कमजोरी देखी जा रही है।
महंगाई पर सीधा असर
रुपये की गिरावट का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।
- तेल महंगा: कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा
- जरूरी सामान महंगे: LPG, प्लास्टिक और पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ सकती हैं
- पेट्रोल-डीजल महंगे: डॉलर मजबूत होने से ईंधन की कीमतें बढ़ने की आशंका
- विदेश यात्रा-पढ़ाई महंगी: डॉलर खरीदने में ज्यादा रुपये खर्च होंगे
- इलेक्ट्रॉनिक्स पर असर: मोबाइल, लैपटॉप और अन्य आयातित सामान महंगे हो सकते हैं
क्यों गिरता है रुपया?
डॉलर के मुकाबले किसी मुद्रा की कीमत गिरने को करेंसी डेप्रिसिएशन कहा जाता है।
- विदेशी निवेशकों की बिकवाली से डॉलर की मांग बढ़ती है
- फॉरेन करेंसी रिजर्व में कमी आने से भी रुपये पर दबाव पड़ता है
- वैश्विक तनाव और व्यापारिक अनिश्चितता का भी असर पड़ता है
अगर भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार रहता है, तो रुपया स्थिर रह सकता है। लेकिन डॉलर की कमी या मांग बढ़ने पर रुपया कमजोर हो जाता है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भरता के चलते आने वाले दिनों में रुपये में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता