जयपुर के जेकेके में बारिश के बीच लोकसंस्कृति का संगम, कलाकारों ने जीता दर्शकों का दिल

जवाहर कला केंद्र में 29वें लोकरंग महोत्सव के तीसरे दिन तमिलनाडु के कड़घम, महाराष्ट्र की लावणी और राजस्थान की लोककलाओं ने दर्शकों का मन मोहा। बारिश के चलते कार्यक्रम ओपन से रंगायन सभागार में शिफ्ट करना पड़ा।
 

बारिश की बूंदें भी जयपुर के लोकरंग की रंगत फीकी नहीं कर सकीं! जवाहर कला केंद्र में चल रहे 11 दिवसीय राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव के 29वें संस्करण के तीसरे दिन देशभर की लोक संस्कृतियों का ऐसा संगम देखने को मिला, जहां कहीं लावणी की थाप गूंजी, तो कहीं घूमर और मांगणियार गायकी ने दर्शकों का दिल जीत लिया। बारिश के कारण कार्यक्रम को ओपन एरिया से शिफ्ट कर रंगायन सभागार में आयोजित करना पड़ा, लेकिन कलाकारों का उत्साह और दर्शकों का जोश बरकरार रहा। इस शाम का खास आकर्षण रहा तमिलनाडु का कड़घम नृत्य। कलाकारों ने सिर पर कलश साधकर शानदार संतुलन और लय का प्रदर्शन किया। वहीं महाराष्ट्र की पारंपरिक लावणी की जोशीली थाप पर दर्शक तालियां बजाते और झूमते नजर आए। राजस्थान की लोककलाओं ने भी खूब रंग जमाया। कठपुतली, घूमर, गवरी, बहुरूपिया, आदिवासी गैर और मांगणियार गायकी ने प्रदेश की समृद्ध लोक विरासत की झलक पेश की। कार्यक्रम का एक खास पल तब देखने को मिला, जब भपंग वादक गफरुद्दीन खान मेवाती ने अपनी प्रस्तुति दी। पद्मश्री सम्मान मिलने के बाद जयपुर में यह उनकी पहली प्रस्तुति थी। उनकी कला से प्रभावित दर्शकों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया। इसके अलावा झारखंड के पुरुलिया छऊ, हिमाचल की किन्नौरी नाटी और देश के अलग-अलग राज्यों से आई लोक प्रस्तुतियों ने भी दर्शकों को आकर्षित किया। कुल मिलाकर, लोकरंग का तीसरा दिन इस बात का खूबसूरत उदाहरण बना कि भारत की लोककलाएं सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, पहचान और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। 

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